Wednesday, February 28, 2024
Ras (रस)

Vatsalya Ras ka Udaharan & Paribhasha – वात्सल्य रस का उदाहरण और परिभाषा

हिंदी व्याकरण में रस का बहुत ही ज्यादा महत्व होता है। रस एक महत्वपूर्ण इकाई है और रस को 9 भागों में विभाजित किया गया है। आज के लेख में वात्सल्य रस की परिभाषा (Vatsalya Ras in Hindi), वात्सल्य रस का उदाहरण (Vatsalya Ras ka Udaharan) आदि के बारे में विस्तार से जानेंगे।

Vatsalya Ras वह भाव है जो हमें माँ के प्यार, संबंध और दुलार की अनूठी अनुभूति करवाता है। यह रस हमें माँ के स्नेहपूर्ण भाव को अनुभव कराता है और हमें उनके साथ एक गहरे बंधन में जोड़ता है। Vatsalya Ras ka Udaharan हमें माँ के प्यार और संबंध की अनूठी भावनाएं समझते हैं और इसे अपने जीवन में अनुभव करते हैं।

Vatsalya Ras ki Paribhasha

काव्य को सुनने पर जब प्रेम विशेषतः अनुजों के प्रति, के से भावों की अनुभूति होती है तो इस अनुभूति को ही वात्सल्य रस कहते हैं। अन्य शब्दों में वात्सल्य रस वह रस है, जिसमें अनुराग व स्नेह का भाव होता है अथवा जिसका स्थायी भाव वत्सल होता है।

वात्सल्य रस के प्रकार

वात्सल्य रस को साहित्यिक शास्त्र में अलग-अलग प्रकारों में विभाजित किया गया है, जो हमें माँ के प्यार के अलग-अलग आयामों को समझने में बहुत हेल्प करते हैं। वात्सल्य रस के प्रमुख प्रकार हैं:

1. माँ-बेटे का वात्सल्य: इसमें हम माँ-बेटे के प्यार और संबंध की भावना का वर्णन करते हैं जो हमें वात्सल्य रस की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने में मदद करते हैं।

2. माँ-बेटी का वात्सल्य: इसमें हम माँ-बेटी के प्यार और संबंध की भावना का वर्णन करते हैं जो हमें वात्सल्य रस के महत्वपूर्ण भूमिका को समझने में मदद करते हैं।

‘वात्सल्य रस’ के अवयव

स्थायी भाव: वत्सल।
आलंबन (विभाव): कोई छोटा बच्चा, शिष्य या कोई भी अनुज।
उद्दीपन (विभाव): बाल चेष्टा, बाल लीला, तुतलाना, मासूमियत इत्यादि।
अनुभाव: आलिंगन, सिर पर हाथ फेरना, पीठ थपथपाना, मुस्कराना, हंस देना, गले से लगा लेना, चूमना इत्यादि।
संचारी भाव: हर्ष, उत्साह, मोह, ममता, गर्व आदि।

Vatsalya Ras ka Udaharan: वात्सल्य रस के उदाहरण

उदाहरण 1: माँ का आँचल

माँ का आँचल हमें उसके प्यार और संबंध की मधुर भावना का अनुभव करवाता है। उसके आँचल में छिपे प्यार और सुरक्षा का आभास हमें वात्सल्य रस की अनूठी अनुभूति करता है।

उदाहरण 2: माँ की ममता

माँ की ममता हमें उसके आंचल में लपेटकर एक शिशु की तरह आनंदित होने का अनुभव कराती है। उसकी ममता की गहराई और निःस्वार्थ प्यार की अनूठी भावना हमें वात्सल्य रस का महत्व समझती है।

वात्सल्य रस के साहित्यिक उदाहरण

Vatsalya Ras ka Udaharan साहित्य के विभिन्न रूपों में मिलता है। यहां कुछ प्रसिद्ध Vatsalya Ras ka Udaharan हैं:

1. “तू किसी रॉक स्टार का नहीं तो माँ का बहू बनेगी”

इस उपन्यास में, लेखिका ने माँ-बेटी के प्यार और संबंध की महत्वपूर्ण भूमिका को बखूबी दिखाया है। इसमें माँ के वात्सल्य और स्नेह की अनूठी भावना का वर्णन किया गया है।

2. “पिता से पत्नी, बेटे से भाई, माँ के से दोस्त”

इस कहानी-संग्रह में, लेखिका ने माँ-बेटे के प्यार और संबंध की सार्थकता को अनूठी भावना के साथ प्रस्तुत किया है। इसमें माँ के वात्सल्य रस का महत्वपूर्ण भूमिका है।

वात्सल्य रस के फिल्मी उदाहरण:Vatsalya Ras ka Udaharan 

भारतीय सिनेमा में Vatsalya Ras ka Udaharan का भी महत्व है। यहां कुछ प्रसिद्ध वात्सल्य रस के फिल्मी उदाहरण हैं:

1. “पिक्चर अभी बाकी है”

इस फिल्म में, अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण ने माँ-बेटे के प्यार की महत्वपूर्ण भूमिका को बखूबी दिखाया है। उनके वात्सल्य रस की अनूठी भावना ने दर्शकों के दिलों में जगह बनाई।

2. “पापा कहते हैं”

इस फिल्म में, अनिल कपूर और अमृता सिंग ने माँ-बेटे के प्यार की सार्थकता को अनूठी भावना के साथ प्रस्तुत किया है। उनके वात्सल्य रस की भावना ने दर्शकों को गहरे संबंधों की अनुभूति कराई।

Vatsalya Ras ka Udaharan & Paribhasha - वात्सल्य रस का उदाहरण और परिभाषा

वात्सल्य रस के उदाहरण (Vatsalya Ras ka Udaharan)

चलत देखि जसुमति सुख पावै
ठुमक-ठुमक पग धरनी रेंगत
जननी देखि दिखावे।।

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।
मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिंब पकरिबैं धावत।।
कबहुँ निरखि हरि आपु छाहँ कौं, कर सौं पकरन चाहत।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत।।

तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूल-धुसर तुम्हारे ये गात।

झूले पर उसे झूलाऊंगी दूलराकर लूंगी वदन चुम
मेरी छाती से लिपटकर वह घाटी में लेगा सहज घूम।।

मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो
बाल ग्वाल सब पीछे परिके बरबस मुख लपटाओ।।

मैया मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परे ये सखा सबै मिलि मेरे मुख लपटायो।
मैं बालक बहियन को छोटो छीको केहि विधि पायो।।

बर दंत की पंगति कुंद कली, अधराधर पल्लव खोलन की।
चपला चमके घन-बीच जगै छवि, मोतिन माल अमोलन की।
घुंघराली लटें लटके मुख- अपर, कुंडल लोल कपोलन की।
निबछावर प्रान करें ‘तुलसी’ बलि जाऊ लला इन बोलन की।

सदेसो देवकी सो कहियो।
हौं तो धाय तिहारे सुत की, कृपा करति ही रहियौ।
जदपि देव तुम जानति है हौ, तऊ मोहि कहि आवै।
प्रात होत मेरे लाल लड़ैते, माखन रोटी भावै।।

बाल दसा सुख निरखि जसोदा, पुनि पुनि नन्द बुलवाति
अंचरा-तर लै ढ़ाकी सूर, प्रभु कौ दूध पियावति।।

मैया कबहु बढ़ेगी चोटी
कित्ति बार मोहे दूध पिवाती भई अजहुँ हे छोटी।।

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Conclusion

वात्सल्य रस एक अद्भुत भाव है जो हमें माँ के प्यार, संबंध और दुलार की अनूठी अनुभूति करवाता है। इस Vatsalya Ras ka Udaharan से हम माँ के प्यार की महत्वपूर्ण भूमिका को समझते हैं और इसे अपने जीवन में अनुभव करते हैं। इसलिए, आइए Vatsalya Ras ka Udaharan के संसार में डूबकर अपने जीवन को माँ के प्यार और संबंध से भरें और दुलार से आनंद उठाएं।

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