Monday, May 20, 2024
Ras (रस)

Ras Kitne Prakar ke Hote Hain – रस के भेद In Hindi

रस वह भाव है जो साहित्यिक रचनाओं में व्यक्त किए जाने वाले भावनात्मक अनुभवों को साझा करता है। यह रस रचनाकार और पाठक दोनों के लिए जरूरी है, क्योंकि इसके माध्यम से रचनाकार अपनी भावनाएं और संवेदनाएं प्रकट करता है और पाठक को उस साहित्यिक कार्य का अध्ययन करने में सहायता मिलती है। Ras Kitne Prakar ke Hote Hain हमें भावनाओं के विविध स्तरों को समझने में मदद करते हैं।

Ras Kitne Prakar ke Hote Hain -रस के भेद 

Ras Kitne Prakar ke Hote Hain, संक्षिप्त अर्थ एवं उदाहरण नीचे दिए गए हैं:

  1. श्रृंगार-रस
  2. हास्य रस
  3. करुण रस 
  4. वीर रस
  5. भयानक रस
  6. रौद्र रस
  7. वीभत्स रस
  8. अद्भुत रस
  9. शांत रस
  10. वात्सल्य रस
  11. भक्ति रस

Ras Kitne Prakar ke Hote Hain

(1) श्रृंगार-रस

श्रृंगार रस को रसराज की उपाधि प्रदान की गयी है।

इसके प्रमुखत: दो भेद बताये गये हैं:

(i) संयोग श्रृंगार (संभोग श्रृंगार) – जब नायक-नायिका के मिलन की स्थिति की व्याख्या होती है वहाँ संयोग श्रृंगार रस होता है।

एक पल मेरे प्रिया के दूग पलक, 
थे उठे ऊपर, सहज नीचे गिरे।
चपलता ने इस विकंपित पुलक से, 
दृढ़ किया मानो प्रणय सम्बन्ध था ॥
– सुमित्रानन्दन पन्त

(ii) वियोग श्रृंगार (विप्रलम्भ श्रृंगार) – जहाँ नायक-नायिका के विरह-वियोग, वेदना की मनोदशा की व्याख्या हो, वहाँ वियोग श्रृंगार रस होता है।

अँखियाँ हरि दरसन की भूखीं। 
कैसे रहें रूप-रस राँची ये बतियाँ सुन रूखीं। 
अवधि गनत इकटक मग जोवत, तन ऐसी नहि भूखीं।
-सूरदास

वियोग श्रृंगार के मुख्यतः चार भेद होते हैं:

  1. पूर्वराग वियोग
  2. मानजनित वियोग
  3. प्रवास जनित वियोग
  4. अभिशाप जनित वियोग

(2) हास्य रस

किसी व्यक्ति की अनोखी विचित्र वेशभूषा, रूप, हाव-भाव को देखकर अथवा सुनकर जो हास्यभाव जाग्रत होता है, वही हास्य रस कहलाता है।

सखि! बात सुनो इक मोहन की, 
निकसी मटुकी सिर रीती ले कै।
पुनि बाँधि लयो सु नये नतना, 
रु कहूँ-कहूँ बुन्द करी छल कै। 
निकसी उहि गैल हुते जहाँ मोहन, 
लीनी उतारि तबै चल कै।
पतुकी धरि स्याम सिखाय रहे, 
उत ग्वारि हँसी मुख आँचल दै ॥

(3) करुण रस 

प्रिय वस्तु या व्यक्ति के समाप्त अथवा नाश कर देने वाला भाव होने पर हृदय में उत्पन्न शोक स्थायी भाव करुण रस के रूप में व्यक्त होता है।

अभी तो मुकुट बँधा था माथ, 
हुए कल ही हल्दी के हाथ।
खुले भी न थे लाज के बोल,
खिले थे चुम्बन शून्य कपोल। 
हाय! रुक गया यहीं संसार,
बना सिन्दूर अनल अंगार ।
– सुमित्रानन्दन पन्त

(4) वीर रस

युद्ध अथवा शौर्य पराक्रम वाले कार्यों में हृदय में जो उत्साह उत्पन्न होता है, उस रस को उत्साह रस कहते है।

हे सारथे ! हैं द्रोण क्या, देवेन्द्र भी आकर अड़े, 
है खेल क्षत्रिय बालकों का व्यूह भेदन कर लड़े।
मैं सत्य कहता हूँ सखे! सुकुमार मत जानो मुझे,
यमराज से भी युद्ध में प्रस्तुत सदा जानो मुझे।

वीररस के चार भेद बताये गये है:

  1. युद्ध वीर
  2. दान वीर
  3. धर्म वीर
  4. दया वीर।

(5) भयानक रस

जब हमें भयावह वस्तु, दृश्य, जीव या व्यक्ति को देखने, सुनने या उसके स्मरण होने से भय नामक भाव प्रकट होता है तो उसे भयानक रस कहा जाता है।

नभ ते झपटत बाज लखि, भूल्यो सकल प्रपंच। 
कंपित तन व्याकुल नयन, लावक हिल्यौ न रंच ॥

(6) रौद्र रस

जिस स्थान पर अपने आचार्य की निन्दा, देश भक्ति का अपमान होता है, वहाँ पर शत्रु से प्रतिशोध की भावना ‘क्रोध’ स्थायी भाव के साथ उत्पन्न होकर रौद्र रस के रूप में व्यक्त होता है।

श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे । 
सब शोक अपना भूलकर करतल-युगल मलने लगे ॥
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े। 
करते हुए घोषणा वे हो गये उठकर खड़े ॥ 
उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा। 
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा ॥ 
मुख बाल-रवि सम लाल होकर ज्वाल-सा बोधित हुआ।
प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ ॥
-मैथिलीशरण गुप्त

(7) वीभत्स रस

घृणित दृश्य को देखने-सुनने से मन में उठा नफरत का भाव विभाव-अनुभाव से तृप्त होकर वीभत्स रस की व्यञ्जना करता है।

रक्त-मांस के सड़े पंक से उमड़ रही है,
महाघोर दुर्गन्ध, रुद्ध हो उठती श्वासा। 
तैर रहे गल अस्थि-खण्डशत, रुण्डमुण्डहत,
कुत्सित कृमि संकुल कर्दम में महानाश के॥

(8) अद्भुत रस

जब हमें कोई अद्भुत वस्तु, व्यक्ति अथवा कार्य को देखकर आश्चर्य होता है, तब उस रस को अद्भुत रस कहा जाता है।

एक अचम्भा देख्यौ रे भाई। ठाढ़ा सिंह चरावै गाई ॥
जल की मछली तरुबर ब्याई। पकड़ि बिलाई मुरगै खाई।।
– कबीर

(9) शान्त रस

वैराग्य भावना के उत्पन्न होने अथवा संसार से असंतोष होने पर शान्त रस की क्रिया उत्पन्न होती है।

बुद्ध का संसार-त्याग-
क्या भाग रहा हूँ भार देख? 
तू मेरी ओर निहार देख-
मैं त्याग चला निस्सार देख। 
अटकेगा मेरा कौन काम। 
ओ क्षणभंगुर भव ! राम-राम ! 
रूपाश्रय तेरा तरुण गात्र,
कह, कब तक है वह प्राण- मात्र,
बाहर-बाहर है टीमटाम।
ओ क्षणभंगुर भव! राम-राम !

(10) वात्सल्य रस

अधिकतर आचार्यों ने वात्सल्य रस को श्रृंगार रस के अन्तर्गत मान्यता प्रदान की है, परन्तु साहित्य में अब वात्सल्य रस को स्वतन्त्रता प्राप्त हो गयी है।

यसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावैं दुलरावैं, जोइ-सोई कछु गावैं । 
जसुमति मन अभिलाष करैं।
कब मेरो लाल घुटुरुवन रेंगैं, 
कब धरनी पग द्वैक घरै।

(11) भक्ति रस

जब आराध्य देव के प्रति अथवा भगवान् के प्रति हम अनुराग, रति करने लगते हैं अर्थात् उनके भजन-कीर्तन में लीन हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में भक्ति रस उत्पन्न होता है। उदाहरण-

जाको हरि दृढ़ करि अंग कर्यो। 
सोइ सुसील, पुनीत, वेद विद विद्या-गुननि भर्यो। 
उतपति पांडु सुतन की करनी सुनि सतपंथ उर्यो । 
ते त्रैलोक्य पूज्य, पावन जस सुनि-सुन लोक तर्यो। 
जो निज धरम बेद बोधित सो करत न कछु बिसर्यो । 
बिनु अवगुन कृकलासकूप मज्जित कर गहि उधर्यो।

Conclusion

Ras Kitne Prakar ke Hote Hain हमारे साहित्यिक अनुभव को समृद्धि देते हैं और हमें रचनाकारों के भावनाओं को गहराई से समझने की अनुमति देते हैं। इसलिए, रसों के अनूठे संसार में डूबकर हम अपने साहित्यिक अध्ययन को और भी रंगीन और सार्थक बना सकते हैं। अपने पठन-पाठन में रसों की महत्वपूर्ण भूमिका को समझते हुए हम साहित्य के भावना के रंगों के सफर में समर्थ होते हैं और अभिनय की उच्च सीमा तक पहुंच सकते हैं। इसलिए, आइए रसों की दुनिया में डूबकर साहित्यिक जगत का आनंद लें और अपने जीवन को भर दें उन साहित्यिक भावनाओं के संग।

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