Tuesday, February 27, 2024
Ras (रस)

Bhayanak Ras ka Udaharan – भयानक रस का उदाहरण

आज के इस लेख में हमनें Bhayanak Ras ka Udaharan से सम्बंधित जानकारी प्रदान की है।

भयानक रस वह भाव है जो हमारे अंतरंग में भय की अनोखी अनुभूति करवाता है। यह रस हमें डरावने और रहस्यमयी अनुभव करवाता है। Bhayanak Ras ka Udaharan हमें भय से निपटने के लिए साहस और विवेक की जरूरत बताते हैं।

भयानक रस के प्रकार

भयानक रस को साहित्यिक शास्त्र में विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया गया है, जो हमें भय की विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करते हैं। भयानक रस के प्रमुख प्रकार हैं:

भानदत्त ने रसतरंगिणी में भयानक रस के दो भेद बताएं हैं:

  1. स्वनिष्ठ भयानक रस (Svanishth Bhayanak Ras)
  2. परनिष्ठ भयानक रस (Parnishth Bhayanak Ras)

स्वनिष्ठ भयानक रस: स्वनिष्ठ भयानक रस वहाँ होता है, जहाँ भय का आलंबन स्वयं आश्रय में रहता है

परनिष्ठ भयानक रस: परनिष्ठ भयानक रस वहाँ होता है, जहाँ भय का आलंबन स्वयं आश्रय में ना होकर उससे बाहर पृथक होता है. अर्थात आश्रय स्वयं अपने किये अपराध से ही डरता है.

Bhayanak Ras ka Udaharan:भयानक रस के उदाहरण

उदाहरण 1. उधर गरजती सिंधु लहरिया कुटिल काल के जालो सी।
चली आ रही फेन उंगलिया फन फैलाए ब्यालो सी।।

उदाहरण 2. विनय न मानत जलधि जड़, गये तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होहि न प्रीति ।।

उदाहरण 3. भेहरात, झॅहरात, दाबानल आयो।
घेर चहुओर करि सोर अंधर वल,
धरनि आकास चहुँ पास छायौ ।

उदाहरण 4. बाल धी विशाल, विकराल, ज्वाला-जाल मानौ,
लंक लीलिबे को काल रसना परारी है।

उदाहरण 5. कैधों व्योम बीद्यिका भरे हैं भूरि धूमकेतु,
वीर रस वीर तरवारि सी उधारी है।

उदाहरण 6. उधर गरजति सिंधु लड़रियां
कुटिल काल के जालो सी।
चली आ रही फेन उगलती
फन फैलाए व्यालों सी।।

Bhayanak Ras ka Udaharan

भयानक रस के अवयव

स्थायी भाव :- भय

संचारी भाव :-

  • त्रास
  • ग्लानि
  • दैन्य
  • शंका
  • चिंता
  • आवेग
  • अमर्ष
  • स्मृति
  • अपस्मार
  • मरण
  • घृणा
  • शोक
  • भरम
  • दैन्य
  • चपलता
  • किंकर्तव्यमूढ़ता
  • निराशा
  • आशा

अनुभाव :-

  • स्वेद
  • कंपन
  • रोमांच
  • हाथ पांव कांपना
  • नेत्र विस्फार
  • भागना
  • स्वर भंग
  • उंगली काटना
  • जड़ता
  • स्तब्धता
  • रोमांच
  • कण्ठावरोध
  • घिग्घी बंधना
  • मूर्छा
  • चित्कार
  • वैवर्ण्य
  • सहायता के लिए इधर-उधर देखना
  • शरण ढूंढना
  • दैन्यप्रकाशन रुदन

आलंबन विभाव :-

  • भयावह जंगली जानवर अथवा बलवान शत्रु
  • पाप या पाप-कर्म
  • सामाजिक तथा अन्य बुराइयां
  • हिंसक जीव-जंतु
  • प्रबल अन्यायकारी व्यक्ति
  • भयंकर अनिष्टकारी वस्तु
  • देवी संकट
  • भूत-प्रेत

उद्दीपन विभाव :-

  • निस्सहाय और निर्भय होना
  • शत्रुओं या हिंसक जीवों की चेस्टाएं
  • आश्रय की असहाय अवस्था
  • आलंबन की भयंकर चेष्टाएँ
  • निर्जन स्थान
  • अपशगुन
  • बद-बंध

भयानक रस की उत्पत्ति

भरतमुनि ने वीभत्स के दर्शन से भयानक की उत्पत्ति स्वीकार की है। लेकिन, आधुनिक मनोविज्ञान ने भय एवं जुगुत्सा, दोनों को प्रवृत्ति प्रेरित प्रधान भावों में परिगणित किया है।

असल में, भयानक को वीभत्स से उत्पन्न होने का कोई समीचीन मनोवैज्ञानिक आधार दिखाई नहीं देता है। बल्कि, भय घृणा की तुलना में अधिक आदिम मनोवृत्ति का दिखाई देता है।

नृतत्त्वविदों ने मानव विकास का अध्ययन करते हुए भय को मानवीय संस्कृति के एक बहुत बड़े भाग का प्रधान कारण सिद्ध किया है।

भरतमुनि ने भयानक के कारणों में विकृत शब्द वाले प्राणियों का दर्शन, गीदड़, उलूक, व्याकुलता, ख़ाली घर, वन-प्रदेश, मरण, सम्बन्धियों की मृत्यु अथवा बंधन का दर्शन, श्रवण अथवा कथन, आदि को निर्दिष्ट किया है।

जबकि, वीभत्स रस के विभावों में अमनोहर तथा अप्रिय का दर्शन, अनिष्टा का श्रवण, दर्शन व कथन, आदि को परिगणित किया है। इस उल्लेख से ही स्पष्ट होता है कि भय के उद्रेक के लिए, जुगुत्सा की अपेक्षा, अधिक अवसर तथा परिस्थितियां उपलब्ध है।

अर्थात, भय का क्षेत्र जुगुत्सा की तुलना में अधिक व्यापक है। इसीलिए, भय जुगुत्सा की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली मनोविकार सिद्ध होता है। पुन: भय के मूल में संरक्षण की प्रवृत्ति कार्यशील होती है।

प्राणिमात्र में भय वर्तमान रहता है तथा मन पर भय का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। इसलिए, भयानक रस को वीभत्स रस से उत्पन्न बताना युक्तिसंगत नहीं है।

‘साहित्यदर्पण’ में भयानक रस को ‘स्त्रीनीचप्रकृति:’ माना गया है। इसका अर्थ यह है कि:- भयानक रस के आश्रय स्त्री, नीच प्रकृति वाले व्यक्ति, बालक तथा कोई भी कातर प्राणी होते है:- ‘भयानको भवेन्नेता बाल: स्त्रीकातर: पुन:’।

अपराध करने वाला व्यक्ति भी अपने अपराध के ज्ञान से भयभीत होता है। भयानक के आलम्बन व्याघ्र आदि हिंसक जीव, शत्रु, निर्जन प्रदेश, स्वयं किया गया अपराध, आदि है।

शत्रु की चेष्टाएँ, असहायता, आदि उद्दीपन है तथा स्वेद, विवर्णता, कम्प, अश्रु, रोमांच, आदि अनुभाव है। त्रास, मोह, जुगुत्सा, दैन्य, संकट, अपस्मार, चिन्ता, आवेग, आदि भयानक रस के व्यभिचारी भाव है।

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Conclusion

भयानक रस एक अनोखी भावना है जो हमें भयभीत होने की अनुभूति करवाती है। इस रस के उदाहरण से हम भय की विभिन्न पहलुओं को समझते हैं और अपने जीवन में साहस और विवेक से इससे निपटने के लिए प्रेरित होते हैं। इसलिए, आइए भयानक रस(Bhayanak Ras ka Udaharan) के संसार में डूबकर अपने जीवन को साहसी बनाएं और डरावने समयों में भी आत्म विश्वास के साथ अग्रसर हों।

दोस्तो हमने इस आर्टिकल में Bhayanak Ras in Hindi के साथ – साथ Bhayanak Ras ka Udaharan, Bhayanak Ras ki Paribhasha, Bhayanak Ras ke bhed के बारे में पढ़ा। हमे उम्मीद है आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। आपको यहां Hindi Grammar के सभी टॉपिक उपलब्ध करवाए गए। जिनको पढ़कर आप हिंदी में अच्छी पकड़ बना सकते है।

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